एक अजीब  दरिया है वो

एक अजीब दरिया है वो

विशाल-सा।

है निर्जन नहीं, फिर भी है एंकात-सा।

नदियां मिलती तो कई हैं उसमें

पर वो बदलता नहीं।

सितारे कितनी भी उसमें अपनी परछाई छोड़ जाए

पर वो चमकता नहीं ।

समेटे रहता है ना जाने कितना कुछ अपने अंदर

पर उफनता नहीं , हमेशा हीं रहता है शांत- सा।