स्त्री मन

मिट्टी, मूरत, सोच, सूरत,
प्रथना-अर्पण, हर क्षण समर्पण,
साज-श्रृंगार, पहनावे का व्यवहार।
क्या कुछ तेरा अपना है?
पलना, बढ़ना, ढलना तेरा, सब तो उनकी मर्जी है।
मन का अपने करो नहीं,
इज्जत सबकी नीचे धरो नहीं,
ऐसी उनकी अर्जी है।
कहते हैं वो, स्त्री मन है, कोमल है
और पुरुषों का मन चंचल है।
सो पाबंदी-दस्तूर बेवजह नहीं,
स्त्रीयों की हीं बेहतरी की पहल है।
तेरा लज्जाना, नज़र झुकाना
बातें सुनना मुस्कुरा कर,
और हंस कर स्वीकार कर जाना,
सब शालीनता हीं तो है।
जो आंखे मिला कुछ कह जाओ,
अपनी सुना कुछ कर जाओ,
तो वो उसी शालीनता में खलल है।
©Dr.Kavita