बोझ

सोचती थी सारी दुनिया कि
था सब कुछ उसके पास।
सुन्दरता, जवानी
और आंखों में कुछ बड़ा करने की प्यास।
उसकी सुंदर काया उदाहरण थी,
जबाव थी, ईश्वर के चमत्कारों की,
उसके होने की,
उसके होने के सवालों की।
 
पर क्या सच में सबकुछ था उसके पास?
गरीबी ने उसका विवाह कुछ जल्दी हीं कराया।
डिग्रियां भी उसकी धरी रह गयीं, जब ससुराल वालों का उसने साथ ना पाया।
 
कोई नहीं जानता था कि उसके आँखों की
खूबसूरती के पीछे छुपे थे उसके आंसू।
तन तो चकाचौंध था,
मगर मन पर फैला था गम का घनघोर अंधेरा।
 
कोई समझ नहीं पाया था उसे।
उसकी भी सबसे हो गयी थी ऐसी कुछ नाउम्मीदी,
कि किसी के समझ में वो आना थी भी नहीं चाहती।
 
अनगिनत तिरस्कार, असंख्य दर्द झेल चुका था अब तक उसका अन्तर्मन।
छिन्न भिन्न हो चुका था उसका सारा स्वप्न।
 
पर अपनी छोटी बिटिया की खातिर,
वो रहती थी सदा हीं मुस्कुराती।
सब ठीक हो जायेगा एक दिन, की आस में,
ना किसी को अपनी व्यथा बताती।
ना थी किसी के आगे आंसू बहाती।
 
वो बस चुप होती थी,
हर वक्त कहीं गुम होती थी।
 
पर उसके चेहरे पर हंसी की कमी
और आंखों में हर पल रहने वाली नमी,
समझने वालों को समझा हीं जाती थी
उसकी अनकही कहानी।
 
जिन्हें दुनिया समझती थी उसका फिक्रमंद।
उन्होंने हीं कर रखा था,
टुकड़े-टुकड़े उसके खुशियों का छंद।
 
बिटिया नहीं बेटा लाओ, नहीं तो घर से बाहर जाओ!
ये धमकियां उसके जिंदगी में आम थी।
सारे एक जैसे थे।
डराना, हाथ उठाना जैसी घटनाएं भी सरेआम थीं।
 
 
अब सवाल था कि कब तक वो ये सब सहेगी?
यूहीं चुप रहेगी?
सब ठीक हो जायेगा..
ये बात, वो कब तक खुद को कहेगी?
 
फिर एक दिन इंतजार खत्म हुआ।
सवाल खत्म हुआ।
जब रोक लिया उसने अपनी ओर उठते हाथों को।
जब उसने सवाल किया था मिला कर, उनकी आँखों में अपनी आँखों को।
 
“भांती नहीं तो शादी क्यों किया था?
मेरी बच्ची और मुझको बोझ हीं समझना था तो गरीब माँ-बाप से मेरे इतना दहेज़ क्यों लिया था?
भोर से शाम, शाम से रात,
सबका हर काम मैं करती हूँ।
फिर मैं बोझ कैसे?
अपना सब कुछ दे दिया है मैंने।
खुद का वजूद तक खो चुकी हूँ।
फिर ये सोच कैसे?
 
बिटिया हो या बेटा, क्या होता है?
बातें तुम सबों की सुन, मेरा दिल रोता है।
 
धमकाया करते हो रोज।
लो, आज मैं खुद निकल जाती हूँ।
ये बच्ची है मेरी, कोई बोझ नहीं।
जीवन इसका मैं अपने दम पर सँवारूंगी,
ये प्रण पाती हूँ।”
 
इतना कह वो चली गयी।
एक हाथ में बच्ची, एक हाथ में डिग्रियां लिए
वो आगे निकल गयी।

©Dr.Kavita

55 thoughts on “बोझ

  1. हिम्मत व हौसला रखना ही
    नारी शक्ति का परिचायक है।
    अति उत्तम वर्णन।

    Liked by 2 people

  2. Very very beautiful 😍i am getting emotional 🥺after reading this. Nice message of equality,no dowry,love of mother and “hum ladkiya ladko se kam thori h”. Feeling proud to be a girl. Thanks for sharing such a lovely poem.😊

    Liked by 4 people

  3. I understand that arranged marriages are still common in India; that is, those in which the parents choose the partner for their children. Staying and reproducing within the same caste and religion are the reasons why these types of unions still prevail.
    Therefore, dramas, as exposed in the poem, are very common. Nothing good can come when the marriage is not for love. The woman bears the worst of it.

    Liked by 3 people

    1. Yes women bears the worst if arranged marriages happen only for dowry and there will be no love and appreciation for them. This is what my poem is telling here.
      But I want to tell you another aspect of arranged marriage in India.
      In India arranged marriages many times become saviour for those who failed to find love in their life. And many times people fall in love with their partners after such marriages.

      Liked by 3 people

  4. आप के इस रचना ने मेरे दिल को छू लिया 🙏🌷😊कितने अरमानों से एक बेटी
    अपने शादी के बाद पति के धर पधारी है, और वहाँ इतना कुछ सहने पड़ी 🥀
    पर उस बेटी के पास अपनी कोमल बेटी और उस की पढ़ाई भी थी 👍🏻🌹

    बहुत ताक़त उस के मन में थी और चली गयी उस कठोर ज़िन्दगी से 👍🏻😊
    ख़ूबसूरत रचना 👌🌷बहुत बधाइयाँ 🌷🙏🌷

    Liked by 1 person

  5. सबकुछ देना दर्द,बीमारी,भूख
    किसी बबदनसीब को,
    मगर हे भगवान
    बिटिया ना देना किसी गरीब को।

    कितनी खूबसूरती से गरीब की बिटिया का दर्द बयाँ किया है और जबरदस्त कटाक्ष भी समाज पर।शानदार।👌👌

    Liked by 1 person

    1. आपके प्रोत्साहन का ही हमें इंतज़ार था🙏
      पसंद करने के लिए ह्रदय से धन्यवाद🙏💕

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