संघर्ष -1

हवाएं आयी थी मुझे हिलाने।

मैं भी पत्थर थी,

स्थिर रही।

फिर उसने काम पर मौसमों को लगाया,

बारिशों को भी बुलवाया,

सबने बहुत ज़ोर लगाया।

नहीं हिली मैं,

पर मैंने खुद पर दरारों को पाया।

शायद आत्मविश्वास हिल चुका था।

फिर भी लगी रही मैं, डटी रही मैं ।

दिन बीते, महिनों- साल गुजर गये।

अब पत्थर पत्थर नहीं, मिट्टी का ढेर हो चुका था।

मुझे आभास हुआ ,

मैं टूट चुकी थी और

अकेले लड़ते-लड़ते बहुत देर हो चुका था।

उलझन

है किसी उत्तर सी स्पष्ट जिंदगी तुम्हारी।

फिर क्यों सवालों में उलझा तुम्हारा संसार है?

कुछ नहीं है ये सब,

निकलो बाहर देखो दुनिया।

बाहर मुश्किलों का अंबार है।

कोशिशें

मैं जलता रहा,

वो रोशनी में खिलती रही।

मैं बेतरतीब गलता रहा,

वो नये-नये साँचों में ढलती रही।

कोशिशें बहुत की उसे पाने की,

मैं पीछे पीछे चलता रहा,

पर वो आगे हीं आगे निकलती रही।

तू चलती रह।

तू चलती रह, रुकती क्यों हैं।

जब हैं हौंसले बुलंद तो तू झुकती क्यों हैं।

ख्याब है जो आज,

वो हकीकत भी होगी कभी।

मालुम है जो तुझे तेरी मंजिल,

तो तू रास्ते में थकती क्यों है।

तू बस विश्वास रख।

आंखें नीचे भले रख,

मीच मत।

हार मत,

गलतफहमियां कोई सींच मत।

तू अभी सुनती रह,

बातें करने वालों को कुछ भी कहती क्यों है?

होगा ये जमाना इक दिन तुम्हारा भी,

संदेह कोई भी तू रखती क्यों है।

तू बस चलती रह, रुकती क्यों हैं।

जब हैं हौंसले बुलंद तो तू झुकती क्यों हैं।

©Dr.Kavita

काबू पा जाना।

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चाहता नहीं मेरा दिल जमाने से हार जाना,
है जज्बा इसमें बेइंतहा, जानता है ये खुद को हजारों दफ़ा आज़माना।


दुनिया का तो काम है गिराना,
मेरी तो चाहत है बस,
उठ कर संभलना और संभल कर दौड़ जाना।


गलती क्या थी मेरी कि जज़्बात कई थे मुझमें, अहसास कई थे?
तो लो,अब सीख लिया है उन पर भी काबू पा जाना।

©Dr.Kavita



मोहब्बत।

रोज़ जीने मरने की चाहत तो न थी मुझे ,

फिर भी मोहब्बत की राह चल पड़ा।

न जानता था उसके घर का पता,

फिर भी उसकी गली की खोज में निकल पड़ा।

था अहसास की ना मुसाफिर होगा पूरे रास्ते ,

और ना हीं होगी कभी मंजिल से मुलाकात ,

फिर भी ना जाने क्यों उस राह मैं था चल पड़ा।

रोज़ जीने मरने की चाहत तो न थी,

फिर भी क्यों मैं  मोहब्बत था कर चला?

जज्बा़त

जब खाली था ये दिल जज्बा़तों से तो,

आंसमा में उड़ाने भरा करता था।

होता गया ये भारी,

ज्यों-ज्यों भरते गये जज़्बात।

तभी तो आज ये तुम्हारे  कदमों पर पड़ा है।

©Dr.Kavita

जिदंगी

जिदंगी के चंद शब्दों में उलझ मत कविता, 

अभी तो पूरी किताब बाकी है। 

पन्ने पर पन्ने पलटने हैं  हर दिन यहां , 

अभी तो कई हिसाब बाकी हैं । 

©Dr.Kavita

मैं हर रोज़ खत्म हो जाता हूँ

बिन जाने गुनाहें अपनी मैं सजाएँ काटे जाती हूँ,

खुद को लोगों से छांटे जाती हूँ ।

बह मुट्ठी से सबकी झर झर कर,

मैं हर रोज़ खत्म हो जाती हूँ।

दुनिया को खुश करने में मैं खुद को खोती जाती हूँ।

फिर हो कर खुद से ही पराया,

मैं उस रोज़ खत्म हो जाती हूँ।

अपनो से चोटें खाती हूँ,

उनसे हीं छुपाए जाती हूँ।

जब हो जाता हूँ जख्मी ज्यादा,

अकेले रोए जाती हूँ।

फिर उन नम आंखों के संग हीं सो,

मैं उस रोज़ खत्म हो जाती हूँ।

जितना पाती हूँ, उतना ही खोए जाती हूँ।

भीड़ में हो कर भी मैं तन्हा हीं रह जाती हूँ।

फिर उस तन्हाई में खो,

मैं उस रोज़ खत्म हो जाती हूँ।

मैं हर रोज़ खत्म हो जाती हूँ।

मैं हर रोज़ खत्म हो जाती हूँ।

©Dr.Kavita

विश्वास

विश्वास है वो शब्द जिसने मुझे

सबसे ज्यादा आघात किया।

जिस पर भी विश्वास किया।

उसने ही मुझसे कपट किया,

मुझे मात दिया।

अब हाल यूं है कि,

बस धोखे से हीं हम खुश हो लेते हैं।

लोग भ्रम जाल भले बुने।

अब हम उसी में सो लेते हैं।

©Dr.Kavita