Parikalpna / परिकल्पना

I am very happy and feeling proud to introduce my First Coffee Table Book named- Parikalpna. 💃💃
This book is very unique and beautiful because Its full with lovely quotes and eye catching colorful prints and images. This book is able to keep you engage because of its beauty, So very suitable for any reception or waiting area or lawn table.
In this book, I tried my best to reach the zenith of my creativity. And I Hope you will love this too.❤

Title: Parikalpna
ISBN: 9781685381073
Format: Paperback
Book Size: 8.5/8.5
Page Count: 100

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मैं इंतजार करूंगी..कि तुम लौट आओगे।

मैं इंतजार करूंगी..
कि तुम लौट आओगे।

तुम लौट आओगे,
अपनी मीठी बातें जेबों मे भर।

तुम लौट आओगे,
मुझे जो पंसद है
वो प्यारी सी मुस्कान
अपने होठों पर रख।

तुम लौट आओगे,
खुशियाँ मेरी सारी
अपने कांधे पर धर।

तुम लौट आओगे,
आंखों में जो मेरी
तुमसे मिलने की आस है
उसकी लाज़ रख।

तुम लौट आओगे,
जानकर मेरी, सिर्फ तेरा हो जाने की हठ।
तुम लौट आओगे।

मैं इंतजार करूंगी..
कि तुम लौट आओगे।

©Dr.Kavita

My Book (Streeman)

First of all I would bow down to God who has given me the ability to think, write and understand the circumstances of others.

My second dedication to this book is to my parents, my two elder brothers and my sister and brother-in-law who encouraged me to write.

My special dedication is to my writer friend Ashish Kumar aka ‘Shanky’ who gave me proper guidance in presenting this book to everyone.

I would also like to express my gratitude to my friends – Alka Bharti, Geetanjali Verma, Ankita Jaiswal, Pankaj Pathak, Bharti Kumari, Neha Prasad, Vijeta Anshul, Kirti Pandey, Kashmiri Khandait, who encouraged me to write sometimes.

In the end, I want to dedicate this book of mine to all those who are willing to understand women and read this work of mine.
This collection of poems entitled ‘Streeman’ focuses on the feelings of women. Being a woman is as sweet and beautiful feeling as it is filled with fights. No matter their class, place or country of origin, women face different problems, different social thinking and different rules. They must pass through various parameters, so that certain feelings of mind are common to all women in this world. This book is totally devoted to women and their sentiments. As a woman writer, I regard it as my duty to express the thoughts and feelings of other women like me in my first book.

This collection of poems entitled ‘Streeman‘ focuses on the feelings of women. Being a woman is as sweet and beautiful feeling as it is filled with fights. No matter their class, place or country of origin, women face different problems, different social thinking and different rules. They must pass through various parameters, so that certain feelings of mind are common to all women in this world. This book is totally devoted to women and their sentiments. As a woman writer, I regard it as my duty to express the thoughts and feelings of other women like me in my first book.

Currently My Book is available on Amazon & Notionpress.
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वो योद्धा है

वो योद्धा है,
वो लड़ना चाहती है।
घायल शोणित पाँव लिए भी
वो चलना चाहती है।
 
वो योद्धा है,
वो कायरता को धिक्कारती है,
बुज़दिली को अस्वीकारती है।
 प्रतिकूल आज लिए,
रक्त में क्रोध की धाह लिए
वो जलना चाहती है।
 वो योद्धा है।
वो लड़ना चाहती है।

©Dr.Kavita

धरती सिर्फ हमारी नहीं

धरती सिर्फ हमारी नहीं,
फिर हम क्यों हैं खड़े दूसरों के हिस्से को रौंदे?
हवाएं बहती हैं तो सिर्फ हमारे लिए नहीं।
तो क्यों है फ़ितरत हमारी
इसे अपने स्वार्थ के लिए विषाक्त बनाना?
क्यों हमारी आदत है अंधाधुंन कार चलाना, बेफिक्र धुआँ फैलाना?
खुद को सुविधाओं से लैस कर,
स्वंय के लिए हवा विशुद्धकरण के अनेकों उपचार लगाना,
और पौधों, जानवरों को दुविधाओं में धकेल आना।
सिर्फ अपने लिए सोचना और
जीवन को उनके विरक्त कर जाना।
ईश्वर का चमत्कार है,झरनों से
सबके लिए पानी गिराना।
फिर किस हक से हम इसका इस्तेमाल कर,
दूसरों के लिए इसे छोड़ जातें हैं गंदा?
किस हक से हम फेंक समुद्रों में कचरा-प्लास्टिक,
बनाते हैं दूसरें जीवों के गले के लिए फंदा।
पंछियों का काम है थक कर पेड़ों पर लौट आना ।
तो जो कम हों पेड़, तो लाज़िम है उनका विलुप्त हो जाना।
कितना उचित है हमारा जंगलों के जंगल काट आना?
घर अपना सजाने में, खुद के लिए कांक्रीट बिछाने में,
मासूम पौधों, पशु-पक्षीयों का जीवन कठिन-दुर्लभ बनाना?
अब भी समय है, हो सके तो इन सब सवालों पर गौर फरमाना।
केवल अपने लिए नहीं,
धरती पर रहने वाले दूसरें जीव-जंतुओं
का भी ख्याल अपने ध्यान में लाना।

©Dr.Kavita

बोझ

सोचती थी सारी दुनिया कि
था सब कुछ उसके पास।
सुन्दरता, जवानी
और आंखों में कुछ बड़ा करने की प्यास।
उसकी सुंदर काया उदाहरण थी,
जबाव थी, ईश्वर के चमत्कारों की,
उसके होने की,
उसके होने के सवालों की।
 
पर क्या सच में सबकुछ था उसके पास?
गरीबी ने उसका विवाह कुछ जल्दी हीं कराया।
डिग्रियां भी उसकी धरी रह गयीं, जब ससुराल वालों का उसने साथ ना पाया।
 
कोई नहीं जानता था कि उसके आँखों की
खूबसूरती के पीछे छुपे थे उसके आंसू।
तन तो चकाचौंध था,
मगर मन पर फैला था गम का घनघोर अंधेरा।
 
कोई समझ नहीं पाया था उसे।
उसकी भी सबसे हो गयी थी ऐसी कुछ नाउम्मीदी,
कि किसी के समझ में वो आना थी भी नहीं चाहती।
 
अनगिनत तिरस्कार, असंख्य दर्द झेल चुका था अब तक उसका अन्तर्मन।
छिन्न भिन्न हो चुका था उसका सारा स्वप्न।
 
पर अपनी छोटी बिटिया की खातिर,
वो रहती थी सदा हीं मुस्कुराती।
सब ठीक हो जायेगा एक दिन, की आस में,
ना किसी को अपनी व्यथा बताती।
ना थी किसी के आगे आंसू बहाती।
 
वो बस चुप होती थी,
हर वक्त कहीं गुम होती थी।
 
पर उसके चेहरे पर हंसी की कमी
और आंखों में हर पल रहने वाली नमी,
समझने वालों को समझा हीं जाती थी
उसकी अनकही कहानी।
 
जिन्हें दुनिया समझती थी उसका फिक्रमंद।
उन्होंने हीं कर रखा था,
टुकड़े-टुकड़े उसके खुशियों का छंद।
 
बिटिया नहीं बेटा लाओ, नहीं तो घर से बाहर जाओ!
ये धमकियां उसके जिंदगी में आम थी।
सारे एक जैसे थे।
डराना, हाथ उठाना जैसी घटनाएं भी सरेआम थीं।
 
 
अब सवाल था कि कब तक वो ये सब सहेगी?
यूहीं चुप रहेगी?
सब ठीक हो जायेगा..
ये बात, वो कब तक खुद को कहेगी?
 
फिर एक दिन इंतजार खत्म हुआ।
सवाल खत्म हुआ।
जब रोक लिया उसने अपनी ओर उठते हाथों को।
जब उसने सवाल किया था मिला कर, उनकी आँखों में अपनी आँखों को।
 
“भांती नहीं तो शादी क्यों किया था?
मेरी बच्ची और मुझको बोझ हीं समझना था तो गरीब माँ-बाप से मेरे इतना दहेज़ क्यों लिया था?
भोर से शाम, शाम से रात,
सबका हर काम मैं करती हूँ।
फिर मैं बोझ कैसे?
अपना सब कुछ दे दिया है मैंने।
खुद का वजूद तक खो चुकी हूँ।
फिर ये सोच कैसे?
 
बिटिया हो या बेटा, क्या होता है?
बातें तुम सबों की सुन, मेरा दिल रोता है।
 
धमकाया करते हो रोज।
लो, आज मैं खुद निकल जाती हूँ।
ये बच्ची है मेरी, कोई बोझ नहीं।
जीवन इसका मैं अपने दम पर सँवारूंगी,
ये प्रण पाती हूँ।”
 
इतना कह वो चली गयी।
एक हाथ में बच्ची, एक हाथ में डिग्रियां लिए
वो आगे निकल गयी।

©Dr.Kavita

याद-ए-कमी।

मेरे रहते,
ख़्वाबों में तुम्हारे आया करती थी जो लड़की,
अब वो तुम्हारी हमनशीं तो नहीं?
जला करता था जो दिया, आंगन में तुम्हारे।
बुझा मिलता है अब वो अक्सर।
कहीं कोई नमीं तो नहीं?
गये थे तुम, हम नहीं।
गर दुखी हो फिर भी..
तो पूछेंगे,
कि अब भी किसी की याद-ए-कमी तो नहीं?
©Dr.Kavita

Thank You

Thank you so much my lovely bloggers for following me on WordPress 100 times over! I’m grateful for all your support. I promise to continue writing harder in serving you.

Thank you to all of my friends and those who have commented on my posts, and replied to my comments. It really means a lot. Everyone is so kind, helpful and welcoming in making my this blogging journey even more amazing! It’s so awesome to see my hobby grow into something even more amazing. Thank you so so much! I hope this blog continues to grow! And I’ll be able to contribute even more in writing world.

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Thank you so much for your kind support.
©Dr.Kavita

जिधर ले चले जिंदगी।

ख़्वाहिशें कहती हैं कुछ,
कुछ.. करतें हैं हम।
सोच तो नई लिए जगते हैं हम।
फिर ज़िम्मेवारियों का दिखता है भरा बस्ता।
फिर क्या?
जिधर ले चले जिंदगी,
उधर निकल पड़ते हैं हम।
©Dr.Kavita

Papa


जितना अच्छा मुस्कुराते हैं,
उससे भी बेहतर..
दर्द छुपाते हैं पापा।
कहते जो कम हैं,
पर कर जाते हैं ज्यादा।
मुश्किल हो कैसी भी,
हल कर जाते हैं पापा।
बड़ी कर आँखे डराते हैं पापा।
पर कुछ हो जो बच्चों को…
तो सहम जाते हैं पापा।
©Dr.Kavita

स्त्री मन

मिट्टी, मूरत, सोच, सूरत,
प्रथना-अर्पण, हर क्षण समर्पण,
साज-श्रृंगार, पहनावे का व्यवहार।
क्या कुछ तेरा अपना है?
पलना, बढ़ना, ढलना तेरा, सब तो उनकी मर्जी है।
मन का अपने करो नहीं,
इज्जत सबकी नीचे धरो नहीं,
ऐसी उनकी अर्जी है।
कहते हैं वो, स्त्री मन है, कोमल है
और पुरुषों का मन चंचल है।
सो पाबंदी-दस्तूर बेवजह नहीं,
स्त्रीयों की हीं बेहतरी की पहल है।
तेरा लज्जाना, नज़र झुकाना
बातें सुनना मुस्कुरा कर,
और हंस कर स्वीकार कर जाना,
सब शालीनता हीं तो है।
जो आंखे मिला कुछ कह जाओ,
अपनी सुना कुछ कर जाओ,
तो वो उसी शालीनता में खलल है।
©Dr.Kavita

जिंदगी एक मिली है ।

अरमानों के अपने पंख हैं,
खवाबों की अपनी उड़ानें।
खुद छू लेंगीं वो आसमां,
तुम उन्हें आजाद तो करो।
शर्तें अपनी बनाओ,
हिसाब अपने लगाओ।
एक बार खुद पर,
एतवार तो करो।
जिंदगी एक मिली है,
बातों में आ दूसरों की,
इसे यूहीं जाया-बरबाद ना करो।
खुल कर जियो।
मन के बंधनों से मुक्त हो,
खुद को आबाद तो करो।
©Dr.Kavita

हम सच में इतने अलग हैं।

कहने के लिए तुम-तुम हो
और मैं-मैं
पर क्या…
हम सच में इतने अलग हैं?
क्या हमारा दिल एक हीं बात पर नहीं रोता,
या खुश होता है?
क्या तुम्हें कुछ अच्छा सुन अच्छा नहीं लगता,
जैसे मुझे लगता है?
या बुरा सुन
क्या तुम्हें दुख नहीं होता?
क्या ख्याब तुम्हारा पीछा वैसे हीं नहीं करते,
जैसे मेरा करते हैं?
क्या तितलियाँ, हवाएं, पहाड़ तुम्हें नहीं लुभाती,
जैसे मुझे लुभाती हैं ?
क्या तुम्हारी तृपता
मेरी संतुष्टि के अनुभव से अलग हो जाती हैं?
और बेचैनी भरी रातें क्या
तुम्हें नहीं सताती हैं?
क्या बच्चों की मुस्कान
तुम्हें आनंदित नहीं करती जैसे मुझे करतीं हैं?
जब हमारी खुशियाँ, दर्द, प्यास,
हर जज़्बात और अहसास
सब एक से हैं,
तो हम अलग कैसे?
तुम-तुम कैसे?
और मैं-मैं कैसे?
ये नफ़रत कैसे?
ये अंतर-भेद कैसे?
©Dr.Kavita

महामारी और सरकारी आकड़ा

आसमानों में गिद्ध,
नदियों में लाशें तैर रहीं थी।
और पुल किनारे पत्रकार खड़ा था,
वो तस्वीरें लेता और सोचता।
कि जिन लाशों को वो गिन रहा है,
क्या सरकारी आकड़ों ने भी उन्हें गिना होगा?
©Dr.Kavita

रूह मेरी सिर्फ जिंदा रहना नहीं चाहती

मेरे एक-एक जज्बे की कायल है मेरी रूह।
कोशिश मेरी कैसी भी हो, छोटी या बड़ी,
मेरे कुछ करने भर से वो उछल पड़ती है खुशी से।
अच्छा लगता है उसे मेरा वो करना, जो मैं करना चाहती हूँ।
मुस्कुराती है वो जब मैं दूसरों के सोच की परवाह नहीं करती।
और सुकून पाती है,
जब जब मैं अपनी जिंदगी अपने शर्तों पर जीती हूँ।
वो चाहती है, मैं अनसुना कर दूँ दुनिया जहान की बातें।
वो चाहती है, मैं सुनूँ सिर्फ उसकी,
या उनकी जो मुझसे स्नेह रखते हैं।
ज्यादा कुछ तो नहीं चाहती वो।
बस वो सोने के पिंजरे में बंद,
आसमान को ताकती किसी पंछी की तरह घुटना नहीं चाहती।
रूह मेरी सिर्फ जिंदा रहना नहीं चाहती,
वो जीना चाहती है।
©Dr.Kavita

महामारी और लाचारी

लाशें जलती हैं बेतहाशा।
सांसे थमती हैं, घुटती हैं।
और हर पल खोती है आशा।
उम्मीद किसने चाहा नहीं?
दुआ किसने मांगी नहीं?
वक्त मुकर्रर होता है माना।
पर कबूल नहीं, यूँ अधुरा सब छोड़ जाना।
जो जग सकते थे उनका बेवक्त सो जाना।
दूर बिलखते अपने और उनका बंद थैलीयों में खो जाना।
मजबूरी है कैसी, की छू नहीं सकते,
आखिरी वक्त भी गलेे लग रो नहीं सकते।
वो बच सकते थे,
वो बच सकते थे,
गर सुदृढ़ सुविधा होती।
बिमारी होती भी, पर लाचारी की दुविधा ना होती।
जब गुजरेगा ये सब,
तो बचे लोग संभालेंगे अपनी अंतर्दशा।
क्योंकि जो हो रहा है, मुश्किल हीं से जायेगी इसकी व्यथा।
©Dr.Kavita

मैं हारने लगी थी ।

गलती हो गयी थी मुझसे,
कि मैं हारने लगी थी।
मंजिल छोड़, अड़चने ताकने लगी थी।
उम्मीद का दामन पकड़ना था मुझे,
पर मैं निराशा का हाथ थमाने लगी थी।
बात लोगों कि सुन, खुद को कम आंकने लगी थी।
गलती हो गयी थी मुझसे,
कि मैं हारने लगी थी।
©Dr.Kavita

उम्मीदें कम ना करना ।

रूह जिंदा रखना
थोड़ी ख़्वाहिशों में भी दम भरना
गिर जाओ चाहे सौ बार
तुम एक बार फिर, आगे कदम धरना
संघर्ष लंबा हो कितना भी
उम्मीदें कम ना करना
किसी और के लिए नहीं,
तुम खुद के लिए खुद की कमियों से लड़ना
रूह जिंदा रखना
थोड़ी ख़्वाहिशों में दम भरना
©Dr.Kavita

वो लड़की

उम्मीदों में खोयी, आखों में खाब़ पिरोयी,

हालातों से.. वो लड़ती लड़की ।

कुछ को वो भांती..

कुछ को ..वो खटकती ।

वैसे चुप होती है,

कहीं गुम होती है ।

पर बात करो तो.. हर बात पर चिढ़ती ।

बेफ़िजूल दस्तूरों पर वो… भड़कती लड़की।

फिर भी Happy women’s day

औरत की काया में तुम्हारी आत्मा घुट रही हो बेशक

पर happy women’s day..

तुम चीखना चाहती हो लेकिन कुछ कह भी नहीं पा रही

पर happy women’s day ..

तुम्हारी जिंदगी के फैसले लिए जाते हैं , पर तुम्हारी राय नहीं

फिर भी happy women’s day ..

तुम happy नहीं , तभी मुस्कुराती हर वक्त हो

इसलिए तुम्हें happy women’s day..

औरत

औरत …

ह्दय तुम्हारा ..संमदर है ।

मन.. जैसे कोई धर्मकथा ।।

सबने हीं तुमसे कुछ पाया है

तुने भी सबका ध्यान धरा।।

तू कल्पतरू की छाँव है वो,

जिससे है संसार हरा।।

स्त्री है तू , तुझमें है सौम्यता ।

पर सोच में है पुरुषार्थ भरा।।

मायावी सा जग है सारा ।

जहाँ तू..निश्छलता की सूरत है ।

सिर्फ ममता नहीं …लौहकन्या भी है तू ।

हर रिश्ते में ढल जाए , पर मजबूती की मूरत है।।

दिल से जिसकी तू हो जाए ,मृत्युशय्या तक साथ निभाए।

साथ तुम्हारा सिर्फ साथ नहीं …

सबकी जरूरत बन जाए ।।

विश्वास मिले जो थोड़ा तुझे , तू जुगनु सी हो जाये ।

अपनी चमक से रोशन करे सबको ,

खुद भी उड़ती – खिलती जाए।।

फिर मीठी बातें कर हमें पागल बनाते क्यों हो??🥴

अपना बनाना नहीं,

तो हमें आजमाते क्यों हो ??

हमसे दिल लगाना नहीं,

तो हमें देख मुस्काराते क्यों हो??

जब शक्ल कहती है हमारी …

की हम आ जायेंगे तुम्हारी बातों में ।

फिर मीठी बातें कर हमें पागल बनाते क्यों हो??

इंतजार

इंतजार है ..

इंतजार के खत्म हो जाने का ।

मिले हर घाव के भर जाने का।

मुड़ मुड़ कर देखने की..

मेरी फ़ितरत के मर जाने का ।

थक कर भी जगे रहने की आदत से

एक दिन थक जाने का ।

मिली हर नाशुक्री , बेकद्री को अपनी जहन से मिटाने का।।

यादों में आने वाली हर बुरी याद के गुम हो जाने का ।

खोए विश्वास को वापिस पाने का ।

फिर से नए ख्याब सजाने का।

झुठी हंसी भुला , दिल से मुस्काने का ।

किसी बाल मन जैसे बेफिक्र हो जाने का।

नाखुश से इस सफर में बेइंतिहा खुशियाँ पाने का।

इंतजार है कभी ना खत्म होने वाले

इस इंतजार के खत्म हो जाने का ।।

इंतजार है …..

ख़ामख़ाह गैर जरूरी बातों का हम ख्याल करते हैं

सोए रहते हैं बेहोश वर्षों तक।

जग जाते हैं इत्तफाकन तो बबाल करते हैं ।

जताते हैं समझदारी अपनी ।

सही गलत क्या है , सवाल करते हैं ।।

इज्जत मिली या जिल्लत, असर नहीं ।

वक्त बचा है कितना, खबर नहीं ,

बरहाल कीमती पल अपना बेकार करते हैं ।।

उलझे रहते हैं सबके तंज- तानो में ।

जो खुद बे-वजूद है उनके संवादों में ।

ख़ामख़ाह गैर-जरूरी बातों का हम ख्याल करते हैं ।

कभी नासमझ ,कभी बेचारी ।

कितनी मुश्किल से कह पाते हैं हम अपनी बात।

जब वो भी ना कबूल होता है।

दिल करता नहीं कुछ कहने को।

चुप रहना हीं मंजूर होता है।

पर यहाँ भी खत्म होती नहीं कहानी।

इस पर भी उठ जाते हैं सवाल।

कभी नासमझ, कभी बेबस, कभी बेचारी ..

जैसे मिल जाते हैं उपनाम।

कहना भी है गुस्ताखी..

हमारा चुप रहना भी फिजूल होता है।

देख लेती हूँ अपनी माँ का चेहरा।

कभी-कभी लगता है सबसे ज्यादा दर्द अपने हिस्से आयी है।

फिर देख लेती हूँ अपनी माँ का चेहरा।

तो हो जाता है अहसास कि बिन मांगे बेइंतिहा खुशियाँ भी हमने पायीं है।

रात के ख्याबों का फ़साना अगर दिन में गुम हो जाए..

रात के ख्याबों का फ़साना अगर दिन में गुम हो जाए..

तो वो कोई ख्याब नहीं ।

दिल में चुप बैठी कोई बात है ।

जो रह-रह कर जग जाती है ।

कभी-कभार याद आती है ।

और अधुरे रंग लिए वक्त- बेवक्त चुभ जाती है ।

अब बनने लगी है इस दर्द से मेरी

तुम्हें मेरे दर्द की मऱहम जो मिल जाए,

तो मुझसे छुपाना।

अब बनने लगी है इस दर्द से मेरी ,

आ गया है इसका साथ निभाना।

इसने अकेलेपन में भी मुझे अकेला ना छोड़ा।

अब ग़लत होगा मेरा इसे छोड़ जाना।

©Dr.Kavita