My First Hindi Novel – Faisla/फैसला

My First Hindi Novel – Faisla/फैसला

This book titled ‘Faisla‘ is a hindi novel. The story of this novel shows the different emotions of human beings and the struggle they have in life regarding relationships and bonds. At every step in life, a person has to take some decision or the other. But any decision of a human being has an effect on him/her as well as the people associated with him/her. This novel is also the story of some of those decisions and the changes that take place in the lives of the characters because of them. This story includes all the sorrows, joys, love, hate, hopes, duties, which are part of any ordinary life. I wish readers of this book will love this story.

Title: Faisla
ISBN: 9781684876259
Format:Paperback
Book Size: 5.5*8.5
Page Count: 78

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Parikalpna / परिकल्पना

I am very happy and feeling proud to introduce my First Coffee Table Book named- Parikalpna. 💃💃
This book is very unique and beautiful because Its full with lovely quotes and eye catching colorful prints and images. This book is able to keep you engage because of its beauty, So very suitable for any reception or waiting area or lawn table.
In this book, I tried my best to reach the zenith of my creativity. And I Hope you will love this too.❤

Title: Parikalpna
ISBN: 9781685381073
Format: Paperback
Book Size: 8.5/8.5
Page Count: 100

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मैं इंतजार करूंगी..कि तुम लौट आओगे।

मैं इंतजार करूंगी..
कि तुम लौट आओगे।

तुम लौट आओगे,
अपनी मीठी बातें जेबों मे भर।

तुम लौट आओगे,
मुझे जो पंसद है
वो प्यारी सी मुस्कान
अपने होठों पर रख।

तुम लौट आओगे,
खुशियाँ मेरी सारी
अपने कांधे पर धर।

तुम लौट आओगे,
आंखों में जो मेरी
तुमसे मिलने की आस है
उसकी लाज़ रख।

तुम लौट आओगे,
जानकर मेरी, सिर्फ तेरा हो जाने की हठ।
तुम लौट आओगे।

मैं इंतजार करूंगी..
कि तुम लौट आओगे।

©Dr.Kavita

My Book (Streeman)

First of all I would bow down to God who has given me the ability to think, write and understand the circumstances of others.

My second dedication to this book is to my parents, my two elder brothers and my sister and brother-in-law who encouraged me to write.

My special dedication is to my writer friend Ashish Kumar aka ‘Shanky’ who gave me proper guidance in presenting this book to everyone.

I would also like to express my gratitude to my friends – Alka Bharti, Geetanjali Verma, Ankita Jaiswal, Pankaj Pathak, Bharti Kumari, Neha Prasad, Vijeta Anshul, Kirti Pandey, Kashmiri Khandait, who encouraged me to write sometimes.

In the end, I want to dedicate this book of mine to all those who are willing to understand women and read this work of mine.
This collection of poems entitled ‘Streeman’ focuses on the feelings of women. Being a woman is as sweet and beautiful feeling as it is filled with fights. No matter their class, place or country of origin, women face different problems, different social thinking and different rules. They must pass through various parameters, so that certain feelings of mind are common to all women in this world. This book is totally devoted to women and their sentiments. As a woman writer, I regard it as my duty to express the thoughts and feelings of other women like me in my first book.

This collection of poems entitled ‘Streeman‘ focuses on the feelings of women. Being a woman is as sweet and beautiful feeling as it is filled with fights. No matter their class, place or country of origin, women face different problems, different social thinking and different rules. They must pass through various parameters, so that certain feelings of mind are common to all women in this world. This book is totally devoted to women and their sentiments. As a woman writer, I regard it as my duty to express the thoughts and feelings of other women like me in my first book.

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वो योद्धा है

वो योद्धा है,
वो लड़ना चाहती है।
घायल शोणित पाँव लिए भी
वो चलना चाहती है।
 
वो योद्धा है,
वो कायरता को धिक्कारती है,
बुज़दिली को अस्वीकारती है।
 प्रतिकूल आज लिए,
रक्त में क्रोध की धाह लिए
वो जलना चाहती है।
 वो योद्धा है।
वो लड़ना चाहती है।

©Dr.Kavita

धरती सिर्फ हमारी नहीं

धरती सिर्फ हमारी नहीं,
फिर हम क्यों हैं खड़े दूसरों के हिस्से को रौंदे?
हवाएं बहती हैं तो सिर्फ हमारे लिए नहीं।
तो क्यों है फ़ितरत हमारी
इसे अपने स्वार्थ के लिए विषाक्त बनाना?
क्यों हमारी आदत है अंधाधुंन कार चलाना, बेफिक्र धुआँ फैलाना?
खुद को सुविधाओं से लैस कर,
स्वंय के लिए हवा विशुद्धकरण के अनेकों उपचार लगाना,
और पौधों, जानवरों को दुविधाओं में धकेल आना।
सिर्फ अपने लिए सोचना और
जीवन को उनके विरक्त कर जाना।
ईश्वर का चमत्कार है,झरनों से
सबके लिए पानी गिराना।
फिर किस हक से हम इसका इस्तेमाल कर,
दूसरों के लिए इसे छोड़ जातें हैं गंदा?
किस हक से हम फेंक समुद्रों में कचरा-प्लास्टिक,
बनाते हैं दूसरें जीवों के गले के लिए फंदा।
पंछियों का काम है थक कर पेड़ों पर लौट आना ।
तो जो कम हों पेड़, तो लाज़िम है उनका विलुप्त हो जाना।
कितना उचित है हमारा जंगलों के जंगल काट आना?
घर अपना सजाने में, खुद के लिए कांक्रीट बिछाने में,
मासूम पौधों, पशु-पक्षीयों का जीवन कठिन-दुर्लभ बनाना?
अब भी समय है, हो सके तो इन सब सवालों पर गौर फरमाना।
केवल अपने लिए नहीं,
धरती पर रहने वाले दूसरें जीव-जंतुओं
का भी ख्याल अपने ध्यान में लाना।

©Dr.Kavita

बोझ

सोचती थी सारी दुनिया कि
था सब कुछ उसके पास।
सुन्दरता, जवानी
और आंखों में कुछ बड़ा करने की प्यास।
उसकी सुंदर काया उदाहरण थी,
जबाव थी, ईश्वर के चमत्कारों की,
उसके होने की,
उसके होने के सवालों की।
 
पर क्या सच में सबकुछ था उसके पास?
गरीबी ने उसका विवाह कुछ जल्दी हीं कराया।
डिग्रियां भी उसकी धरी रह गयीं, जब ससुराल वालों का उसने साथ ना पाया।
 
कोई नहीं जानता था कि उसके आँखों की
खूबसूरती के पीछे छुपे थे उसके आंसू।
तन तो चकाचौंध था,
मगर मन पर फैला था गम का घनघोर अंधेरा।
 
कोई समझ नहीं पाया था उसे।
उसकी भी सबसे हो गयी थी ऐसी कुछ नाउम्मीदी,
कि किसी के समझ में वो आना थी भी नहीं चाहती।
 
अनगिनत तिरस्कार, असंख्य दर्द झेल चुका था अब तक उसका अन्तर्मन।
छिन्न भिन्न हो चुका था उसका सारा स्वप्न।
 
पर अपनी छोटी बिटिया की खातिर,
वो रहती थी सदा हीं मुस्कुराती।
सब ठीक हो जायेगा एक दिन, की आस में,
ना किसी को अपनी व्यथा बताती।
ना थी किसी के आगे आंसू बहाती।
 
वो बस चुप होती थी,
हर वक्त कहीं गुम होती थी।
 
पर उसके चेहरे पर हंसी की कमी
और आंखों में हर पल रहने वाली नमी,
समझने वालों को समझा हीं जाती थी
उसकी अनकही कहानी।
 
जिन्हें दुनिया समझती थी उसका फिक्रमंद।
उन्होंने हीं कर रखा था,
टुकड़े-टुकड़े उसके खुशियों का छंद।
 
बिटिया नहीं बेटा लाओ, नहीं तो घर से बाहर जाओ!
ये धमकियां उसके जिंदगी में आम थी।
सारे एक जैसे थे।
डराना, हाथ उठाना जैसी घटनाएं भी सरेआम थीं।
 
 
अब सवाल था कि कब तक वो ये सब सहेगी?
यूहीं चुप रहेगी?
सब ठीक हो जायेगा..
ये बात, वो कब तक खुद को कहेगी?
 
फिर एक दिन इंतजार खत्म हुआ।
सवाल खत्म हुआ।
जब रोक लिया उसने अपनी ओर उठते हाथों को।
जब उसने सवाल किया था मिला कर, उनकी आँखों में अपनी आँखों को।
 
“भांती नहीं तो शादी क्यों किया था?
मेरी बच्ची और मुझको बोझ हीं समझना था तो गरीब माँ-बाप से मेरे इतना दहेज़ क्यों लिया था?
भोर से शाम, शाम से रात,
सबका हर काम मैं करती हूँ।
फिर मैं बोझ कैसे?
अपना सब कुछ दे दिया है मैंने।
खुद का वजूद तक खो चुकी हूँ।
फिर ये सोच कैसे?
 
बिटिया हो या बेटा, क्या होता है?
बातें तुम सबों की सुन, मेरा दिल रोता है।
 
धमकाया करते हो रोज।
लो, आज मैं खुद निकल जाती हूँ।
ये बच्ची है मेरी, कोई बोझ नहीं।
जीवन इसका मैं अपने दम पर सँवारूंगी,
ये प्रण पाती हूँ।”
 
इतना कह वो चली गयी।
एक हाथ में बच्ची, एक हाथ में डिग्रियां लिए
वो आगे निकल गयी।

©Dr.Kavita

याद-ए-कमी।

मेरे रहते,
ख़्वाबों में तुम्हारे आया करती थी जो लड़की,
अब वो तुम्हारी हमनशीं तो नहीं?
जला करता था जो दिया, आंगन में तुम्हारे।
बुझा मिलता है अब वो अक्सर।
कहीं कोई नमीं तो नहीं?
गये थे तुम, हम नहीं।
गर दुखी हो फिर भी..
तो पूछेंगे,
कि अब भी किसी की याद-ए-कमी तो नहीं?
©Dr.Kavita

फिर मीठी बातें कर हमें पागल बनाते क्यों हो??🥴

अपना बनाना नहीं,

तो हमें आजमाते क्यों हो ??

हमसे दिल लगाना नहीं,

तो हमें देख मुस्काराते क्यों हो??

जब शक्ल कहती है हमारी …

की हम आ जायेंगे तुम्हारी बातों में ।

फिर मीठी बातें कर हमें पागल बनाते क्यों हो??

इंतजार

इंतजार है ..

इंतजार के खत्म हो जाने का ।

मिले हर घाव के भर जाने का।

मुड़ मुड़ कर देखने की..

मेरी फ़ितरत के मर जाने का ।

थक कर भी जगे रहने की आदत से

एक दिन थक जाने का ।

मिली हर नाशुक्री , बेकद्री को अपनी जहन से मिटाने का।।

यादों में आने वाली हर बुरी याद के गुम हो जाने का ।

खोए विश्वास को वापिस पाने का ।

फिर से नए ख्याब सजाने का।

झुठी हंसी भुला , दिल से मुस्काने का ।

किसी बाल मन जैसे बेफिक्र हो जाने का।

नाखुश से इस सफर में बेइंतिहा खुशियाँ पाने का।

इंतजार है कभी ना खत्म होने वाले

इस इंतजार के खत्म हो जाने का ।।

इंतजार है …..

ख़ामख़ाह गैर जरूरी बातों का हम ख्याल करते हैं

सोए रहते हैं बेहोश वर्षों तक।

जग जाते हैं इत्तफाकन तो बबाल करते हैं ।

जताते हैं समझदारी अपनी ।

सही गलत क्या है , सवाल करते हैं ।।

इज्जत मिली या जिल्लत, असर नहीं ।

वक्त बचा है कितना, खबर नहीं ,

बरहाल कीमती पल अपना बेकार करते हैं ।।

उलझे रहते हैं सबके तंज- तानो में ।

जो खुद बे-वजूद है उनके संवादों में ।

ख़ामख़ाह गैर-जरूरी बातों का हम ख्याल करते हैं ।

कभी नासमझ ,कभी बेचारी ।

कितनी मुश्किल से कह पाते हैं हम अपनी बात।

जब वो भी ना कबूल होता है।

दिल करता नहीं कुछ कहने को।

चुप रहना हीं मंजूर होता है।

पर यहाँ भी खत्म होती नहीं कहानी।

इस पर भी उठ जाते हैं सवाल।

कभी नासमझ, कभी बेबस, कभी बेचारी ..

जैसे मिल जाते हैं उपनाम।

कहना भी है गुस्ताखी..

हमारा चुप रहना भी फिजूल होता है।