वो पन्ने

दुनिया के सामने यूँ रोया ना करो,
टूटे हुए दिल से निकले शब्दों को

यूँ खोया ना करो।
बेहतर हो, तुम उन्हें पन्नों में उतार लो।
दर्द अपने सारे शब्दों में ढाल लो।
बिखरे वो पन्ने भले ना समझ पायें
कि तुम  बिखरे हो कितना।
पर शायद वो तुम्हें सहेज लें उतना,
कोई और सहेज ना पाए तुम्हें जितना।

©Dr.Kavita

बोझ

सोचती थी सारी दुनिया कि
था सब कुछ उसके पास।
सुन्दरता, जवानी
और आंखों में कुछ बड़ा करने की प्यास।
उसकी सुंदर काया उदाहरण थी,
जबाव थी, ईश्वर के चमत्कारों की,
उसके होने की,
उसके होने के सवालों की।
 
पर क्या सच में सबकुछ था उसके पास?
गरीबी ने उसका विवाह कुछ जल्दी हीं कराया।
डिग्रियां भी उसकी धरी रह गयीं, जब ससुराल वालों का उसने साथ ना पाया।
 
कोई नहीं जानता था कि उसके आँखों की
खूबसूरती के पीछे छुपे थे उसके आंसू।
तन तो चकाचौंध था,
मगर मन पर फैला था गम का घनघोर अंधेरा।
 
कोई समझ नहीं पाया था उसे।
उसकी भी सबसे हो गयी थी ऐसी कुछ नाउम्मीदी,
कि किसी के समझ में वो आना थी भी नहीं चाहती।
 
अनगिनत तिरस्कार, असंख्य दर्द झेल चुका था अब तक उसका अन्तर्मन।
छिन्न भिन्न हो चुका था उसका सारा स्वप्न।
 
पर अपनी छोटी बिटिया की खातिर,
वो रहती थी सदा हीं मुस्कुराती।
सब ठीक हो जायेगा एक दिन, की आस में,
ना किसी को अपनी व्यथा बताती।
ना थी किसी के आगे आंसू बहाती।
 
वो बस चुप होती थी,
हर वक्त कहीं गुम होती थी।
 
पर उसके चेहरे पर हंसी की कमी
और आंखों में हर पल रहने वाली नमी,
समझने वालों को समझा हीं जाती थी
उसकी अनकही कहानी।
 
जिन्हें दुनिया समझती थी उसका फिक्रमंद।
उन्होंने हीं कर रखा था,
टुकड़े-टुकड़े उसके खुशियों का छंद।
 
बिटिया नहीं बेटा लाओ, नहीं तो घर से बाहर जाओ!
ये धमकियां उसके जिंदगी में आम थी।
सारे एक जैसे थे।
डराना, हाथ उठाना जैसी घटनाएं भी सरेआम थीं।
 
 
अब सवाल था कि कब तक वो ये सब सहेगी?
यूहीं चुप रहेगी?
सब ठीक हो जायेगा..
ये बात, वो कब तक खुद को कहेगी?
 
फिर एक दिन इंतजार खत्म हुआ।
सवाल खत्म हुआ।
जब रोक लिया उसने अपनी ओर उठते हाथों को।
जब उसने सवाल किया था मिला कर, उनकी आँखों में अपनी आँखों को।
 
“भांती नहीं तो शादी क्यों किया था?
मेरी बच्ची और मुझको बोझ हीं समझना था तो गरीब माँ-बाप से मेरे इतना दहेज़ क्यों लिया था?
भोर से शाम, शाम से रात,
सबका हर काम मैं करती हूँ।
फिर मैं बोझ कैसे?
अपना सब कुछ दे दिया है मैंने।
खुद का वजूद तक खो चुकी हूँ।
फिर ये सोच कैसे?
 
बिटिया हो या बेटा, क्या होता है?
बातें तुम सबों की सुन, मेरा दिल रोता है।
 
धमकाया करते हो रोज।
लो, आज मैं खुद निकल जाती हूँ।
ये बच्ची है मेरी, कोई बोझ नहीं।
जीवन इसका मैं अपने दम पर सँवारूंगी,
ये प्रण पाती हूँ।”
 
इतना कह वो चली गयी।
एक हाथ में बच्ची, एक हाथ में डिग्रियां लिए
वो आगे निकल गयी।

©Dr.Kavita

याद-ए-कमी।

मेरे रहते,
ख़्वाबों में तुम्हारे आया करती थी जो लड़की,
अब वो तुम्हारी हमनशीं तो नहीं?
जला करता था जो दिया, आंगन में तुम्हारे।
बुझा मिलता है अब वो अक्सर।
कहीं कोई नमीं तो नहीं?
गये थे तुम, हम नहीं।
गर दुखी हो फिर भी..
तो पूछेंगे,
कि अब भी किसी की याद-ए-कमी तो नहीं?
©Dr.Kavita

Thank You

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©Dr.Kavita

जिधर ले चले जिंदगी।

ख़्वाहिशें कहती हैं कुछ,
कुछ.. करतें हैं हम।
सोच तो नई लिए जगते हैं हम।
फिर ज़िम्मेवारियों का दिखता है भरा बस्ता।
फिर क्या?
जिधर ले चले जिंदगी,
उधर निकल पड़ते हैं हम।
©Dr.Kavita

Papa


जितना अच्छा मुस्कुराते हैं,
उससे भी बेहतर..
दर्द छुपाते हैं पापा।
कहते जो कम हैं,
पर कर जाते हैं ज्यादा।
मुश्किल हो कैसी भी,
हल कर जाते हैं पापा।
बड़ी कर आँखे डराते हैं पापा।
पर कुछ हो जो बच्चों को…
तो सहम जाते हैं पापा।
©Dr.Kavita

स्त्री मन

मिट्टी, मूरत, सोच, सूरत,
प्रथना-अर्पण, हर क्षण समर्पण,
साज-श्रृंगार, पहनावे का व्यवहार।
क्या कुछ तेरा अपना है?
पलना, बढ़ना, ढलना तेरा, सब तो उनकी मर्जी है।
मन का अपने करो नहीं,
इज्जत सबकी नीचे धरो नहीं,
ऐसी उनकी अर्जी है।
कहते हैं वो, स्त्री मन है, कोमल है
और पुरुषों का मन चंचल है।
सो पाबंदी-दस्तूर बेवजह नहीं,
स्त्रीयों की हीं बेहतरी की पहल है।
तेरा लज्जाना, नज़र झुकाना
बातें सुनना मुस्कुरा कर,
और हंस कर स्वीकार कर जाना,
सब शालीनता हीं तो है।
जो आंखे मिला कुछ कह जाओ,
अपनी सुना कुछ कर जाओ,
तो वो उसी शालीनता में खलल है।
©Dr.Kavita

जिंदगी एक मिली है ।

अरमानों के अपने पंख हैं,
खवाबों की अपनी उड़ानें।
खुद छू लेंगीं वो आसमां,
तुम उन्हें आजाद तो करो।
शर्तें अपनी बनाओ,
हिसाब अपने लगाओ।
एक बार खुद पर,
एतवार तो करो।
जिंदगी एक मिली है,
बातों में आ दूसरों की,
इसे यूहीं जाया-बरबाद ना करो।
खुल कर जियो।
मन के बंधनों से मुक्त हो,
खुद को आबाद तो करो।
©Dr.Kavita

हम सच में इतने अलग हैं।

कहने के लिए तुम-तुम हो
और मैं-मैं
पर क्या…
हम सच में इतने अलग हैं?
क्या हमारा दिल एक हीं बात पर नहीं रोता,
या खुश होता है?
क्या तुम्हें कुछ अच्छा सुन अच्छा नहीं लगता,
जैसे मुझे लगता है?
या बुरा सुन
क्या तुम्हें दुख नहीं होता?
क्या ख्याब तुम्हारा पीछा वैसे हीं नहीं करते,
जैसे मेरा करते हैं?
क्या तितलियाँ, हवाएं, पहाड़ तुम्हें नहीं लुभाती,
जैसे मुझे लुभाती हैं ?
क्या तुम्हारी तृपता
मेरी संतुष्टि के अनुभव से अलग हो जाती हैं?
और बेचैनी भरी रातें क्या
तुम्हें नहीं सताती हैं?
क्या बच्चों की मुस्कान
तुम्हें आनंदित नहीं करती जैसे मुझे करतीं हैं?
जब हमारी खुशियाँ, दर्द, प्यास,
हर जज़्बात और अहसास
सब एक से हैं,
तो हम अलग कैसे?
तुम-तुम कैसे?
और मैं-मैं कैसे?
ये नफ़रत कैसे?
ये अंतर-भेद कैसे?
©Dr.Kavita

महामारी और सरकारी आकड़ा

आसमानों में गिद्ध,
नदियों में लाशें तैर रहीं थी।
और पुल किनारे पत्रकार खड़ा था,
वो तस्वीरें लेता और सोचता।
कि जिन लाशों को वो गिन रहा है,
क्या सरकारी आकड़ों ने भी उन्हें गिना होगा?
©Dr.Kavita

रूह मेरी सिर्फ जिंदा रहना नहीं चाहती

मेरे एक-एक जज्बे की कायल है मेरी रूह।
कोशिश मेरी कैसी भी हो, छोटी या बड़ी,
मेरे कुछ करने भर से वो उछल पड़ती है खुशी से।
अच्छा लगता है उसे मेरा वो करना, जो मैं करना चाहती हूँ।
मुस्कुराती है वो जब मैं दूसरों के सोच की परवाह नहीं करती।
और सुकून पाती है,
जब जब मैं अपनी जिंदगी अपने शर्तों पर जीती हूँ।
वो चाहती है, मैं अनसुना कर दूँ दुनिया जहान की बातें।
वो चाहती है, मैं सुनूँ सिर्फ उसकी,
या उनकी जो मुझसे स्नेह रखते हैं।
ज्यादा कुछ तो नहीं चाहती वो।
बस वो सोने के पिंजरे में बंद,
आसमान को ताकती किसी पंछी की तरह घुटना नहीं चाहती।
रूह मेरी सिर्फ जिंदा रहना नहीं चाहती,
वो जीना चाहती है।
©Dr.Kavita

महामारी और लाचारी

लाशें जलती हैं बेतहाशा।
सांसे थमती हैं, घुटती हैं।
और हर पल खोती है आशा।
उम्मीद किसने चाहा नहीं?
दुआ किसने मांगी नहीं?
वक्त मुकर्रर होता है माना।
पर कबूल नहीं, यूँ अधुरा सब छोड़ जाना।
जो जग सकते थे उनका बेवक्त सो जाना।
दूर बिलखते अपने और उनका बंद थैलीयों में खो जाना।
मजबूरी है कैसी, की छू नहीं सकते,
आखिरी वक्त भी गलेे लग रो नहीं सकते।
वो बच सकते थे,
वो बच सकते थे,
गर सुदृढ़ सुविधा होती।
बिमारी होती भी, पर लाचारी की दुविधा ना होती।
जब गुजरेगा ये सब,
तो बचे लोग संभालेंगे अपनी अंतर्दशा।
क्योंकि जो हो रहा है, मुश्किल हीं से जायेगी इसकी व्यथा।
©Dr.Kavita

मैं हारने लगी थी ।

गलती हो गयी थी मुझसे,
कि मैं हारने लगी थी।
मंजिल छोड़, अड़चने ताकने लगी थी।
उम्मीद का दामन पकड़ना था मुझे,
पर मैं निराशा का हाथ थमाने लगी थी।
बात लोगों कि सुन, खुद को कम आंकने लगी थी।
गलती हो गयी थी मुझसे,
कि मैं हारने लगी थी।
©Dr.Kavita

उम्मीदें कम ना करना ।

रूह जिंदा रखना
थोड़ी ख़्वाहिशों में भी दम भरना
गिर जाओ चाहे सौ बार
तुम एक बार फिर, आगे कदम धरना
संघर्ष लंबा हो कितना भी
उम्मीदें कम ना करना
किसी और के लिए नहीं,
तुम खुद के लिए खुद की कमियों से लड़ना
रूह जिंदा रखना
थोड़ी ख़्वाहिशों में दम भरना
©Dr.Kavita

वो लड़की

उम्मीदों में खोयी, आखों में खाब़ पिरोयी,

हालातों से.. वो लड़ती लड़की ।

कुछ को वो भांती..

कुछ को ..वो खटकती ।

वैसे चुप होती है,

कहीं गुम होती है ।

पर बात करो तो.. हर बात पर चिढ़ती ।

बेफ़िजूल दस्तूरों पर वो… भड़कती लड़की।

फिर भी Happy women’s day

औरत की काया में तुम्हारी आत्मा घुट रही हो बेशक

पर happy women’s day..

तुम चीखना चाहती हो लेकिन कुछ कह भी नहीं पा रही

पर happy women’s day ..

तुम्हारी जिंदगी के फैसले लिए जाते हैं , पर तुम्हारी राय नहीं

फिर भी happy women’s day ..

तुम happy नहीं , तभी मुस्कुराती हर वक्त हो

इसलिए तुम्हें happy women’s day..

औरत

औरत …

ह्दय तुम्हारा ..संमदर है ।

मन.. जैसे कोई धर्मकथा ।।

सबने हीं तुमसे कुछ पाया है

तुने भी सबका ध्यान धरा।।

तू कल्पतरू की छाँव है वो,

जिससे है संसार हरा।।

स्त्री है तू , तुझमें है सौम्यता ।

पर सोच में है पुरुषार्थ भरा।।

मायावी सा जग है सारा ।

जहाँ तू..निश्छलता की सूरत है ।

सिर्फ ममता नहीं …लौहकन्या भी है तू ।

हर रिश्ते में ढल जाए , पर मजबूती की मूरत है।।

दिल से जिसकी तू हो जाए ,मृत्युशय्या तक साथ निभाए।

साथ तुम्हारा सिर्फ साथ नहीं …

सबकी जरूरत बन जाए ।।

विश्वास मिले जो थोड़ा तुझे , तू जुगनु सी हो जाये ।

अपनी चमक से रोशन करे सबको ,

खुद भी उड़ती – खिलती जाए।।

फिर मीठी बातें कर हमें पागल बनाते क्यों हो??🥴

अपना बनाना नहीं,

तो हमें आजमाते क्यों हो ??

हमसे दिल लगाना नहीं,

तो हमें देख मुस्काराते क्यों हो??

जब शक्ल कहती है हमारी …

की हम आ जायेंगे तुम्हारी बातों में ।

फिर मीठी बातें कर हमें पागल बनाते क्यों हो??

इंतजार

इंतजार है ..

इंतजार के खत्म हो जाने का ।

मिले हर घाव के भर जाने का।

मुड़ मुड़ कर देखने की..

मेरी फ़ितरत के मर जाने का ।

थक कर भी जगे रहने की आदत से

एक दिन थक जाने का ।

मिली हर नाशुक्री , बेकद्री को अपनी जहन से मिटाने का।।

यादों में आने वाली हर बुरी याद के गुम हो जाने का ।

खोए विश्वास को वापिस पाने का ।

फिर से नए ख्याब सजाने का।

झुठी हंसी भुला , दिल से मुस्काने का ।

किसी बाल मन जैसे बेफिक्र हो जाने का।

नाखुश से इस सफर में बेइंतिहा खुशियाँ पाने का।

इंतजार है कभी ना खत्म होने वाले

इस इंतजार के खत्म हो जाने का ।।

इंतजार है …..

ख़ामख़ाह गैर जरूरी बातों का हम ख्याल करते हैं

सोए रहते हैं बेहोश वर्षों तक।

जग जाते हैं इत्तफाकन तो बबाल करते हैं ।

जताते हैं समझदारी अपनी ।

सही गलत क्या है , सवाल करते हैं ।।

इज्जत मिली या जिल्लत, असर नहीं ।

वक्त बचा है कितना, खबर नहीं ,

बरहाल कीमती पल अपना बेकार करते हैं ।।

उलझे रहते हैं सबके तंज- तानो में ।

जो खुद बे-वजूद है उनके संवादों में ।

ख़ामख़ाह गैर-जरूरी बातों का हम ख्याल करते हैं ।

कभी नासमझ ,कभी बेचारी ।

कितनी मुश्किल से कह पाते हैं हम अपनी बात।

जब वो भी ना कबूल होता है।

दिल करता नहीं कुछ कहने को।

चुप रहना हीं मंजूर होता है।

पर यहाँ भी खत्म होती नहीं कहानी।

इस पर भी उठ जाते हैं सवाल।

कभी नासमझ, कभी बेबस, कभी बेचारी ..

जैसे मिल जाते हैं उपनाम।

कहना भी है गुस्ताखी..

हमारा चुप रहना भी फिजूल होता है।

पर तुम्हें चाहना..कभी बुरा नहीं हो सकता ।

दर्द मिलना…होता होगा बुरे कर्मों की सजा।

पर मेरा तुम्हें चाहना..कभी बुरा नहीं हो सकता।

माना मिलता नहीं इश्क की राह में कुछ भी।

पर कुछ पाना ..

मेरा तुमसे दिल लगाने की वजह नहीं हो सकता।

फ़साना फिर ना पुरा हुआ ..

मैं मिलती रही खुद से..

पर तुम्हें हर पल खोती रही।

ऐसे हमारी दूरियों से मेरी नजदीकी होती रही।

फ़साना फिर ना पुरा हुआ..अधुरे से।

तुम जाते रहे मुस्कुराते हुए..

और मैं फिर रोती रही।

आज की सच्चाई।

अगर तुम्हारे कोई साथ नहीं।

तो बिन पूछे सच्चाई..

हम कह देते हैं कि हम भी नहीं तुम्हारे।

पर ग़र पागल है..

तुम्हारे पीछे पूरी ये दुनिया।

तो बिन जाने पूरा किस्सा..

हम भी हैं उस भीड़ का हिस्सा।

इतने खूबसूरत मुझे लगते हो तुम..

सबको जला दूँ तुम्हारी तारीफों से।

इतने खूबसूरत मुझे लगते हो तुम।

तुम भी कभी देखा करो मेरी आखों से खुद को।

फिर समझोगे कि क्यों कहती हूँ..

कि मेरे लिए ख़ुदा के सूरत से हो तुम।

हम तो नालायक थे, हैं और रहेंगे ..

कह कर उनको थक गया की मुझे भूल जाओ।

याद करने की सही वज़ह नहीं हूँ मैं।

जो तुम्हें याद करें.. तुम भी उन्हें अपनी यादों में लाओ।

सुधारने की हमें जधोजध में ना आओ।

हम तो नालायक थे, हैं और रहेंगे ।

तुम अपनी जिंदगी किसी अच्छे के साथ बिताओ।

देख लेती हूँ अपनी माँ का चेहरा।

कभी-कभी लगता है सबसे ज्यादा दर्द अपने हिस्से आयी है।

फिर देख लेती हूँ अपनी माँ का चेहरा।

तो हो जाता है अहसास कि बिन मांगे बेइंतिहा खुशियाँ भी हमने पायीं है।

रात के ख्याबों का फ़साना अगर दिन में गुम हो जाए..

रात के ख्याबों का फ़साना अगर दिन में गुम हो जाए..

तो वो कोई ख्याब नहीं ।

दिल में चुप बैठी कोई बात है ।

जो रह-रह कर जग जाती है ।

कभी-कभार याद आती है ।

और अधुरे रंग लिए वक्त- बेवक्त चुभ जाती है ।

अब बनने लगी है इस दर्द से मेरी

तुम्हें मेरे दर्द की मऱहम जो मिल जाए,

तो मुझसे छुपाना।

अब बनने लगी है इस दर्द से मेरी ,

आ गया है इसका साथ निभाना।

इसने अकेलेपन में भी मुझे अकेला ना छोड़ा।

अब ग़लत होगा मेरा इसे छोड़ जाना।

©Dr.Kavita

माना गलती मेरी थी

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तुमने कहा – आओ…

मैं आयी।

तुमने कहा- जाओ…

मैं लौट आयी।

माना गलती मेरी थी।

क्योंकि कदम मेरे थे…

पाँव हमारा था।

पर इस दिल का क्या?

जो सिर्फ समझता इशारा…

तुम्हारा था।

©Dr.Kavita

दर्द समझने की भी क्या काबिलियत

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दर्द समझने की भी क्या काबिलियत दी है खुदा तुमने मुझे,

कि मुस्कुराहटें छोड़, हर दफ़ा उदास कहानी की तरफ मुड़ जाती हूँ।

ऐसे खो देती हूँ हर बार खुश होने का मौका,

और दूसरों को दुख से उबारने की तैयारी में जुड़ जाती हूँ

©Dr.Kavita

कहीं तो महफ़ूज रखो।

लिखती इसलिए नहीं की तुम मेरे एहसासों को महसूस करो।

पर इसलिए कि गर मर जाऊं अनायास ,

तभी तुम मुझे महसूस करो।

यादों में ही सही ..याद रखो..

दिल में ना तो ना सही,

कहीं तो महफ़ूज रखो।

झूठ

झूठ ओढे सच तलाश रहें।

लोग भी नादान है अब

झूठ के डर से झूठ जी जा रहें।

जानते नहीं ,

सच को सिर्फ सच है पहचानता

और झूठ को देर सवेरे सब।

वो प्रेम कहाँ से लाऊं ?

उदास चेहरे पर मुस्कान कहाँ से लाऊं?

जो खो दिया ,वो पहचान कहाँ से लाऊं?

मन मेरा भी है कि करूणा रस से वात्सल्य और श्रिंगार रस की कवि बन जाऊं ।

पर वो प्रेम और स्वाभिमान कहाँ से लाऊं ।

जब लगे कि खुदा हीं रूठा बैठा हो तो वो अनुमोद, वरदान कहाँ से लाऊं ।

उदास चेहरे पर मुस्कान कहाँ से लाऊं?

वो खोयी हुई पहचान कहाँ से लाऊं?

तुम नाराज किससे हो..

तुम नाराज किससे हो??

अपने दिल से ….??

दिमाग से…??

अनंतरमन की आवाज से ..??

तुम्हारी कौन सी ऐसी भावना है जिसे शब्द नहीं मिल रहे ..??

कौन से ऐसे जज़्बात है जिसे सूरत(ए)हाल नहीं मिल रहा ??

कौन से ऐसे खयालात है जिन्हे कहने को अलफाज नहीं मिल रहे ??

कमी क्या है समझ क्यूं नहीं पा रहे ..??

नमी क्यों है समझ क्यूं नहीं पा रहे ..??

सवाल वही है ।

तुम नाराज किससे हो…??

अपने  दिल से ….??

दिमाग से…??

या अनंतरमन की आवाज से ..??

एक अजीब  दरिया है वो

एक अजीब दरिया है वो

विशाल-सा।

है निर्जन नहीं, फिर भी है एंकात-सा।

नदियां मिलती तो कई हैं उसमें

पर वो बदलता नहीं।

सितारे कितनी भी उसमें अपनी परछाई छोड़ जाए

पर वो चमकता नहीं ।

समेटे रहता है ना जाने कितना कुछ अपने अंदर

पर उफनता नहीं , हमेशा हीं रहता है शांत- सा।

मलाल – 2

मलाल ये नहीं की हमें सजाएँ पर सजाएँ मिल रही हैं ।

मलाल तो बस इतना है कि कोई हमें हमारी ख़ता नहीं बता रहा।

मलाल – 1

मलाल ये नहीं की हम मरते और वो जीते हैं ।

मलाल तो इस बात का है कि हमें मरता देख वो थोड़ा और जी लेते हैं ।

जब मरना भी मुहाल हो जाए

जब जीना एक मलाल बन जाए

और मरना भी मुहाल हो जाए ,

तो समझना सही समय आ गया है ।

समय आ गया है ,

खुद में हीं खोने का

सारे बँधनों से विमुक्त होने का।

मिली गालियों पर भी मुसकराने का।

वक्त बेवक्त झुम जाने का।

समय आ गया है ,

महफ़िलों में रंग जमाने का

हर बात पर टिठठकीयां लगाने का ।

बच्चों के संग दौड़ जाने का

बूढों के संग झपकीयां लगाने का ।

समय आ गया है ,

पिछे का पिछे छोड़ आगे बढ़ जाने का,

अपने दिलों से हर बोझ हटाने का

और जिंदगी को पूरा जी जाने का।

आज की दुनिया

कितनी अहमियत दे रखी है तुमने इस दुनिया को इनसान ,

वो दुनिया जो किसी की परवाह नहीं करती।

वो जो अकेला छोड़ जाती है एक अकेले को,

और भीड़ बन जाती है ईक झूठी तस्वीर के पीछे ।

वो दुनिया जो भूखे को रोटी मांगने पर धक्का मारती है ,

और रोटी फेंकने वाले से डर कर कुछ नहीं कह पाती है।

वो दुनिया जो समाज के नाम पर इंसानियत भुल जाती है ,

और कभी कभी तो हैवानियत की भी दलीलें दे जाती है ।

क्यों इतनी अहमियत दे रखी है तुमने इस दुनिया को इनसान ।

बहकता  फतंगा

जलते आग के लपटों की तरफ़

वो बढ़ता फतंगा।

रोक रहे जिसे सब,

तेज रोशनी में चकाचौंध , अपनी हीं बातों

पर वो अड़ता फंतगा।

कल से अनजान,

आज में खोया , मदमस्त होया,

वो बहकता फतंगा।

जलते आग के लपटों की तरफ़

वो बढ़ता फतंगा।

हिन्दी

दुनिया बड़ी है, यहाँ देश कईं हैं।

उनमें विशेष देश हमारा,

जिसे और भी विशेष बनाती है हिन्दी ।

जहाँ करोड़ों की आबादी है ,हजारों बोलियाँ बोली जाती हैं ।

वहाँ 22 प्रमुख भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी बन जाती है हिन्दी ।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक सबको एक धागे में पिरोये रख पाती है हिन्दी ।

अनेकता में एकता, भिन्नताओं में अभिन्नता लाती है हिन्दी ।

यहाँ के कण-कण में बस कर यहाँ की मातृभाषा बन जाती है हिन्दी ।

हजारों सालों का इतिहास लिए,

अरबी, फ़ारसी, पश्तो, तुर्की जैसी कई भाषाएँ अपने अंदर समाती है हिन्दी ।

तुलसी-सूरदास, मलिक मुहम्मद, मीराबाई, बिहारी, भूषण जैसे महान कवियों की रचनाओं को अमर बनाती है हिन्दी ।

और मुग़लों, अंग्रेज़ों का विरोध सह कर भी,

घर-घर पहुँच , खुद की रक्षक बन जाती है हिन्दी ।

जहाँ लोग कईं हैं, संस्कृति कईं हैं,

मान कईं-पहचान कईं हैं।

वहाँ अनूठा रगं लिए, ईक अभिमान संग लिए,

हमें राष्ट्रवाद का अनुभव कराती है हिन्दी ।

भारत के जन-जन से जुड़ कर, इसे गौरवान्वित कर जाती है हिन्दी ।

अनोखा है भारत अपना , इसे और भी अनोखा बनाती है हिन्दी ।

तस्वीरें

मेरी ये तस्वीरें मुझे मेरी क़ीमत बताती हैं।

बहुत मर कर देखा सब पर।

मेरा ये हँसता चेहरा , मेरी ये मुस्कान

अब मुझे खुद पर मरना सिखाती हैं ।

सबको चाहा , बेहद चाहा ,

पर मेरा उन तस्वीरों में तनहा होना

मुझे मेरी हद बताती है ।

मेरी ये तस्वीरें मुझे आत्मप्रेम सिखाती हैं ।

ख़्वाहिशें।

मोह ये भंग होता नहीं,

नई ख़्वाहिशें हर दिन निकल आतीं हैं कई।

बन मोम इन ख़्वाहिशों को ले

वो फिर पिघल गयी कहीं,

पर ख़्वाहिशें ख़त्म हुई नहीं पूरी ,

रह गयी इस बार भी थोड़ी।
©Dr.Kavita

अनसुना।

मैं बातें कहती हूँ उनको

जो मेरी सुनते नहीं।

क्योंकी वो बेहतर हैं उनसे,

जिन्होंने मुझे सुनकर अनसुना कर दिया।

मैं लड़ता रहती हूँ उनसे,

जो मेरे नहीं ।

अपनों से कुछ कहना,

मैंने कब का बंद कर दिया।

मेरा पता।

मेरा पता जो तुम्हें मिले, तो बताना ।

खुद को तलाश रही हूँ मैं।

चुन लेना तुम मुझे,

कल जो पड़ी मिलूं मैं कहीं।

मेरे बिखरने की उम्मीद है।

चमकता आकाश

ये चमकता आकाश कहता है मुझसे,

रोशनी में इसकी मैं भी दमक लूँ।

भूल जाऊँ किरदार नारी का

और बस

बन एक स्वतंत्रत आत्मा

इस संसार मैं रह लूँ।

छोड़ आऊँ प्रतिशोधचारियों को मैं बहुत पीछे,

और अपने व्यक्तितव की परिभाषा

अपने पसंद के शब्दों से मैं गढ़ लूँ ।

तोड़ लूं बंधन सारे,

और बन कोई काफ़िरा बहक लूँ ।

होकर बावला सा परिंदा कभी इधर तो कभी उधर चहक लूँ।

देख लूँ सारी दुनिया अपनी नज़रों से,

इसका अच्छा- बुरा

सब अपनी समझ से मैं समझ लूँ ।

ऐ ज़माना,

जो दो तुम मुझे

मेरी ये आज़ादी सारी,

फिर कहना ग़र मैं पूरा संसार न बदल दूँ ।

क्यों ख्याब ख्याब है?

क्यों ख्याब ख्याब है?

क्यों ये हकीकत नहीं बन जाती?

क्यों नहीं इच्छाएं पूरी हो जाती हैं सारी??

और क्यों डर दूर नहीं हो जाता ?

क्यों गहराता जाता है अंधेरा ?

और क्यों हिम्मत है बिखरा जाता ?

समाज

है क्या ये समाज??

हजारों पथ है बने हुए।

पर मंजिल की कोई ओर नहीं ।

कहते हैं मत भटको,

ना नये रास्ते पकड़ो।

जो है पहले से तय,

बस उस पर हीं जा अटको ।

निर्माण जब इसका तुमने किया ।

खुद के मतलब के लिए

झूठा नियम चुना,

क़ानून बुना।

फिर क्यों कहते हो ये अडिग है?

जो गये इनके आगे

तो तुम गलत हो,

ये हमेशा सटीक है।

समाज..

तो क्या है ये समाज??

जो होना है वो होता आया है।

सब ने अपनी सोच से,

अपना एक समाज बनाया है।

उसी में खुद को और अपनो को बसाया है,

पर दोष वो हमेशा समाज को देता आया है।

तो है क्या ये समाज??

जो खुली है सोच तुम्हारी,

तो प्रगती का साधन है ये समाज।

इसमें अच्छे विचार लाओगे,

अच्छे को आगे बढ़ाओगे।

ग़र संकरी है सोच,

तो किसी पिंजरे सा जकड़ा,

कैदखाने सा संकरा,

बस एक बंधन है समाज ।

जिसे ना चाहे अपनाओगे,

सही हो या ग़लत इसकी हर बात

बस माने जाओगे ।

नफ़रत

नफ़रत दिल में बसा कर कहाँ तक जा पाओगे ?

घुम घुमा कर फिर वहीं आजाओगे।

ना बढ़ने देगा तुम्हें ये आगे ,

ना तुम अतीत को पीछे छोड़ पाओगे।

करोगे कोशिश भी ,तो संग इसके तो

कभी ना किसी को

भुल पाओगे ।

जो मिटा लोगे इसे दिल से,

हटा लोगे जिंदगी से

तो नई मंजिल, नये रास्ते ,नई रोशनी को पाओगे ।

और जो रखे रहे साथ इसे,

तो बस थमे रहे जाओगे ।

नफ़रत दिल में बसा कर कहाँ तक जा पाओगे ?

उसे उतना भी मुझसे  प्यार नहीं जितना वो बोला करता है ।

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उसे उतना भी मुझसे प्यार नहीं

जितना वो बोला करता है।

भीड़ में

मैं जो

खो जाऊँ ,

तो उसको मैं अज़ीज़ नहीं,

ये राज़ वो खोला करता है।

रंग स्याह मेरी भी होगी उस पर,

यूहीं तो वो रंगीन नहीं।

श्रेय उसका भी होगा हीं कुछ,

यूँहीं तो मैं ग़मगीन नहीं।

मैंने उस पर अपना सब वार दिया।

और वो मुझे अपनो से तौला करता है।

कहती हूँ ना मैं,

उसे उतना भी मुझसे प्यार नहीं

जितना वो बोला करता है।

©Dr.Kavita

ऐ चिडियाँ तू उड़ जाना।

ऐ चिडियाँ तू उड़ जाना।

उड़ कर वापस ना आना।

ये पिंजरा तेरी जगह नहीं।

पंख मड़ोड़े बैठे रहना,

जो खिल सकता है

उसे जोड़े रहना,

क्या ये कोई सज़ा नहीं?

यहाँ तू जब भी अपने पंख फैलाएगी,

टकराकर वापस गिर जायेगी।

बाहर दुनिया बड़ी खुली है।

वहाँ तू नाच सकेगी,

झूमेगी, गायेगी।

यहाँ ऐसी कोई वज़ह नहीं।

ए चिडियाँ तू उड़ जाना।

उड़ कर वापस ना आना।

ये पिंजरा तेरी जगह नहीं।

बेहतर।

तुम्हारे साथ रह कर मैं बर्बाद जाती हूँ।

पर तुम्हारे बिना भी तो मैं बर्बाद हो जाती हूँ।

तो बेहतर यही होगा

कि तुम मुझे अपने साथ रख लो।

रूठो ना मुझसे कभी,

और मेरी हर बात रख लो।

संघर्ष -1

हवाएं आयी थी मुझे हिलाने।

मैं भी पत्थर थी,

स्थिर रही।

फिर उसने काम पर मौसमों को लगाया,

बारिशों को भी बुलवाया,

सबने बहुत ज़ोर लगाया।

नहीं हिली मैं,

पर मैंने खुद पर दरारों को पाया।

शायद आत्मविश्वास हिल चुका था।

फिर भी लगी रही मैं, डटी रही मैं ।

दिन बीते, महिनों- साल गुजर गये।

अब पत्थर पत्थर नहीं, मिट्टी का ढेर हो चुका था।

मुझे आभास हुआ ,

मैं टूट चुकी थी और

अकेले लड़ते-लड़ते बहुत देर हो चुका था।

उलझन

है किसी उत्तर सी स्पष्ट जिंदगी तुम्हारी।

फिर क्यों सवालों में उलझा तुम्हारा संसार है?

कुछ नहीं है ये सब,

निकलो बाहर देखो दुनिया।

बाहर मुश्किलों का अंबार है।

कोशिशें

मैं जलता रहा,

वो रोशनी में खिलती रही।

मैं बेतरतीब गलता रहा,

वो नये-नये साँचों में ढलती रही।

कोशिशें बहुत की उसे पाने की,

मैं पीछे पीछे चलता रहा,

पर वो आगे हीं आगे निकलती रही।

तू चलती रह।

तू चलती रह, रुकती क्यों हैं।

जब हैं हौंसले बुलंद तो तू झुकती क्यों हैं।

ख्याब है जो आज,

वो हकीकत भी होगी कभी।

मालुम है जो तुझे तेरी मंजिल,

तो तू रास्ते में थकती क्यों है।

तू बस विश्वास रख।

आंखें नीचे भले रख,

मीच मत।

हार मत,

गलतफहमियां कोई सींच मत।

तू अभी सुनती रह,

बातें करने वालों को कुछ भी कहती क्यों है?

होगा ये जमाना इक दिन तुम्हारा भी,

संदेह कोई भी तू रखती क्यों है।

तू बस चलती रह, रुकती क्यों हैं।

जब हैं हौंसले बुलंद तो तू झुकती क्यों हैं।

©Dr.Kavita

काबू पा जाना।

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चाहता नहीं मेरा दिल जमाने से हार जाना,
है जज्बा इसमें बेइंतहा, जानता है ये खुद को हजारों दफ़ा आज़माना।


दुनिया का तो काम है गिराना,
मेरी तो चाहत है बस,
उठ कर संभलना और संभल कर दौड़ जाना।


गलती क्या थी मेरी कि जज़्बात कई थे मुझमें, अहसास कई थे?
तो लो,अब सीख लिया है उन पर भी काबू पा जाना।

©Dr.Kavita



मोहब्बत।

रोज़ जीने मरने की चाहत तो न थी मुझे ,

फिर भी मोहब्बत की राह चल पड़ा।

न जानता था उसके घर का पता,

फिर भी उसकी गली की खोज में निकल पड़ा।

था अहसास की ना मुसाफिर होगा पूरे रास्ते ,

और ना हीं होगी कभी मंजिल से मुलाकात ,

फिर भी ना जाने क्यों उस राह मैं था चल पड़ा।

रोज़ जीने मरने की चाहत तो न थी,

फिर भी क्यों मैं  मोहब्बत था कर चला?

जज्बा़त

जब खाली था ये दिल जज्बा़तों से तो,

आंसमा में उड़ाने भरा करता था।

होता गया ये भारी,

ज्यों-ज्यों भरते गये जज़्बात।

तभी तो आज ये तुम्हारे  कदमों पर पड़ा है।

©Dr.Kavita